नेता प्रतिपक्ष, लोकसभा | सांसद, रायबरेली | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
(संदेश मंच से पढ़ा गया)
राहुल गांधी का बयान/संदेश
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने आदिवासी एकता महाजुटान में भेजे अपने संदेश में कहा कि वे कार्यक्रम में उपस्थित नहीं हो पाने के बावजूद आदिवासी समाज के अधिकार, पहचान और सम्मान की लड़ाई में मजबूती से साथ खड़े हैं।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस के लिए आदिवासी अधिकार सर्वोपरि हैं। संविधान की पांचवीं अनुसूची, पेसा कानून और वन अधिकार कानून का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जल-जंगल-जमीन की रक्षा करने वाले समुदायों की अपने संसाधनों पर मजबूत आवाज हो।
राहुल गांधी ने विकास को विस्थापन से अलग बताते हुए कहा कि विकास लोगों की भागीदारी, सहमति और सम्मान के साथ होना चाहिए तथा झारखंड के प्राकृतिक संसाधनों पर यहां के लोगों की सार्थक भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
परिसीमन को उन्होंने केवल लोकसभा-विधानसभा की सीटों का प्रश्न नहीं, बल्कि आदिवासियों के हक और अधिकार की लड़ाई से जोड़ा।
*इस पर भाजपा के राष्ट्रीय मंत्री और राज्यसभा सांसद डॉ. प्रदीप कुमार वर्मा का यह जवाब है:-
“राहुल गांधी जी, संविधान का अनुच्छेद 332(3) स्पष्ट रूप से कहता है कि किसी राज्य की विधानसभा में अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या उनकी जनसंख्या के अनुपात के अनुरूप होगी। फिर किस आधार पर यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि भाजपा ने झारखंड की आदिवासी सीटें घटाने का कोई फैसला कर लिया है?
आज की तारीख में झारखंड के लिए न कोई नया परिसीमन ड्राफ्ट आया है, न निर्वाचन आयोग ने 28 ST सीटें घटाने का कोई प्रस्ताव जारी किया है। निर्वाचन आयोग स्वयं स्पष्ट करता है कि अगला सामान्य परिसीमन 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के प्रकाशित आंकड़ों के बाद संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार होगा।

राहुल गांधी जी, अगर आपको वास्तव में आदिवासी अस्तित्व की चिंता है, तो केवल सीटों की राजनीति मत कीजिए—आदिवासी आबादी क्यों घट रही है, इसका भी जवाब खोजिए।
केंद्र सरकार ने झारखंड हाईकोर्ट में दाखिल हलफनामे में, Registrar General of India से सत्यापित आंकड़ों के आधार पर बताया कि संथाल परगना में अनुसूचित जनजातियों की हिस्सेदारी 1951 के 44.67 प्रतिशत से घटकर 2011 में 28.11 प्रतिशत रह गई। उसी हलफनामे में साहिबगंज और पाकुड़ के रास्ते घुसपैठ होने का आकलन दर्ज है और पलायन, कम जन्मदर, ईसाई धर्मांतरण सहित अन्य कारणों की भी जांच की आवश्यकता बताई गई है।
आपको केवल आदिवासी की सीट की चिंता है या आदिवासी की घटती आबादी, उसकी जमीन और उसके अस्तित्व की भी चिंता है?
पांचवीं अनुसूची, PESA और वन अधिकार कानून किसी राजनीतिक दल की जागीर नहीं हैं। ये भारत के संविधान और कानून द्वारा आदिवासी समाज को मिले अधिकार हैं और उनकी रक्षा करना हम सबकी संवैधानिक जिम्मेदारी है।
आदिवासी समाज को काल्पनिक भय दिखाकर राजनीतिक रोटी सेंकने के बजाय कांग्रेस को बताना चाहिए कि संथाल परगना की बदलती जनसांख्यिकी, आदिवासी जमीन की सुरक्षा, पलायन और अवैध घुसपैठ जैसे गंभीर प्रश्नों पर वह मौन क्यों है।
परिसीमन संविधान से होगा, किसी पार्टी के डर और दुष्प्रचार से नहीं।
आदिवासी समाज को डर नहीं—अपनी जमीन, अपनी पहचान और अपने संवैधानिक अधिकारों की वास्तविक सुरक्षा चाहिए।”

